गणतंत्र दिवस पर विशेष …. मुबारक हो………?

  गणतंत्र दिवस पर विशेष ……………..मुबारक हो………?                                                                     

 नेताओं , नौकरशाहों, पूंजीपतियों, सेठ साहूकारों , अपराधियों, ठगों, तांत्रिकों, धूर्त और ब्लैकमेलरों को गणतंत्र दिवस की 70 वीं वर्षगांठ मुबारक हो… यह गणतंत्र अब ऐसे ही वर्गो और तत्वों की दूरभिसंधियों पर टिके  हुए लोकतंत्र के दानवी बना दिए गए पेट में देश की सवा अरब आबादी को लील चुकी है और लोग उसके भीतर कीड़े मकोड़ों की तरह बिलबिला रहे हैं इसी गणतंत्र की आधारशिला पर चंद लोगों की अय्याशी के आरामदेह शयनकक्ष खड़े किए गए हैं जो काम शतावदियो में मुगलों और गोरों ने इस देश् कि जनता के साथ नही किया वह इसी देश् के कालों ने अपने ही लोंगों के साथ कर डाला है । कोई भी कालिख इन चेहरों को स्याह करने के लिये नाकाफी होगी , जिनके चेहरों से इस गणतंत्र की कांति दमक रही है जिसे उन्होंने भोली भाली जनता को छलकर उसके रक्त से सिंचित किया है ।
  गुलामी की सराहना की अनुगूंज यदि नेपथ्य में बहुत दूर से भी सुनाई देती हो तो वह भीषण निंदनीय है , लेकिन यह कहे बिना रहा नही जा सकता कि गणतंत्र के इन 70 सालों में इस देश् के लोगों ने उसमे भी बहुत कुछ खो दिया है , जिसे वे सैकड़ों वर्षों की दासता और भीषण दरिद्रता में भी सहेजकर रखे हुये थे । स्वाधीनता के इन सालों में लोकतंत्र खास वजहों से स्थापित की गई प्रवर्तियों के हाथों बिक गया । भृस्टाचार और आपराधिक वर्चस्व ने राजनैतिक पार्टियों को उदरस्थ कर लिया और देश् के लोगों के समक्ष विकल्पहीनता ही नहीं किंकर्तव्यविमूढ़ की भी स्थिति पैदा कर दी गई। इन हालातों में लोगों को भाग्यवादी ,निराशावादी भी बनाया और गलत लोगों से प्रेरणा लेकर वे भी छोटे स्वार्थो की दुनियां बुनने लगे ?  इस देश् कि स्वाधीनता उनके लिए है और लोकतंत्र में सरकार व व्यवस्था के कर्णधार वे खुद है , वे मालिक है इस देश् के , यह तथ्य कुरतापूर्वक कुचला गया । इसकी कल्पना तक लोकतंत्र के मसीहाओं के मन मे भी पैदा नही होने दी गयी। 
               लोकतंत्र में जनता मालिक होती है । वह वोट से अपने नुमाइंदे चुनती है और फिर जनता की सेवा के लिए यदि हम उन्हें साफ शव्दों से नौकर न कहें तो व्यवस्था बनाये रखने के लिए कर्मचारी रखे जाते है , लेकिन ये नोकर पहले ही दिन से मालिक बन गये और इन्होंने देश् के मालिकों को उनकी ही जायदाद की चौखट से बहुत दूर विवश और तकलीफो से भरी गुलामी की जिंदगी के चक्रव्यूह में झोक दिया । जनता ने अपनी आजादी को बरकरार रखने के लिए जिन्हें प्रतिनिधि चुना उन्होंने अपराधियो और नोकरशाहों से गलबहियां डालकर जनता को ठग लिया और उसे भयभीत करना शुरू कर दिया । वे कौन लोग है..? जो इस आज़ाद देश् में वैभवशाली मकानों में रह रहे है और आलीशान कारो  में घूम रहे है.. ? वे कौन लोग है जो इस देश् के मालिकों को लाचार भिखारियों में बदल रहे है.. ? उन्हें दूध दलिया और रोजगार के नाम पर कर्ज़ का कुछ रुपया हेराफेरी करके पहुँचा रहे है ? ये वही लोग है जिन्होंने इस देश् कि आज़ादी और लोकतंत्र पर कब्जा कर लिया है तथा शेष जनता को गुलामी से बदत्तर हालात में रहने को विवश किया है। यह कैसा गणतंत्र है जिसमे अब लोगों को सिर्फ अपनी आजीविका के लिए ही संघर्ष नही करना पड़ता बल्कि गुंडो से अपनी इज्ज़त बचाने का बन्दोबस्त भी खुद ही करना पड़ता है । इस देश् में आम आदमी की सुनवाई नही होती है । उसके लिए न्याय का कोई दरवाजा शेष ही रह गया है.. ? थोड़े से लोगों ने आजादी और लोकतंत्र को अपनी तंदुरुस्ती और हिफाज़त के लिए घालमेल का क्रीड़ांगन बना लिया है । सभी राजनैतिक पार्टियों में नीचे से ऊपर तक दुरभिसंधियाँ है और जनता के वोटों को ठगने का कुटिल मंशाओं से प्रेरित घृणित खेल बस चल रहा है, इस देश् मे गणतंत्र का मतलब इतना ही है कि कुछ सरकारी समारोह हो जाएंगे, अवकाश रहेगा, गणतंत्र की औपचारिकता निभाएंगे । बस इससे अधिक कुछ नही ? इस देश् का आम आदमी आज़ाद कभी नही हो सकता । उसे आज़ाद होने और लोकतंत्र स्थापित करने के लिये अभी बहुत कुछ करना शेष है । इसके लिये उसे अगुवाई करने वाले की जरूरत है और चाणक्य, गांधी जैसे मसीहा पथ प्रदर्शक की ज़रूरत है । हम भी उसके साथ ही प्रतीक्षारत है…..राकेश प्रजापति
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