आज फिरोज गांधी जैसा कोई नेता नहीं जो संसद में दमदार तरीके से कर सके घोटालों की पोल खोल..

स्वतंत्र भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में फ़िरोज गांधी वह पहले शख्स थे जिन्होंने उस समय के सबसे बड़े आर्थिक घोटाले का पर्दाफाश किया था। उन्हें भ्रष्टाचार के खिलाफ युद्ध छेड़ने वाला पहला व्यक्ति माना जा सकता है…

गिरीश मालवीय का विश्लेषण :- तीन चार दिन पहले अचानक चैनल चेंज करते वक्त एक टीवी डिबेट पर नजर पड़ गयी, एंकर थे सुमित अवस्थी। बहस शायद मोदी जी के साढ़े 4 साल के कार्यकाल पर चल रही थी, लेकिन सुमित अवस्थी जी कांग्रेस के प्रवक्ता पर लगातार हावी हो रहे थे मानो सारी गलती कांग्रेस की हो। अचानक माइक स्टूडियो में मौजूद दर्शकों की तरफ ले जाया गया और एक प्रायोजित सवाल कांग्रेस के प्रवक्ता की ओर उछाला गया कि बताइये फिरोज गाँधी कौन थे?

मैं बिल्कुल हैरान रह गया कि बात मोदी सरकार के कार्यकाल की हो रही थी और टारगेट फिरोज गांधी को किया जा रहा था। खैर यह मोदी के हाथों बिके हुए मीडिया का चरित्र है इसलिए बात आयी गयी हो गयी। लेकिन दो दिन पहले पत्रकार अजित अंजुम जी ने एक वीडियो में फिरोज गांधी का बड़ा लम्बा जिक्र किया तो एक बार फिर दिलचस्पी फिरोज गाँधी के बारे में जानने की हुई।

जब उस व्यक्ति के बारे में जानने की कोशिश की जिनका नाम फिरोज गांधी था और जो मरहूम प्राइमिनिस्टर इंदिरा गाँधी के पति थे और राजीव और संजय गाँधी के पिता थे तो लगा कि आज के तमाम बड़े वो नेता जिनके लोग भक्त बने फिरते हैं, वह फिरोज गांधी के पाँव की धूल के बराबर भी नहीं हैं।

स्वतंत्र भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में फ़िरोज गाँधी वह पहले शख्स थे जिन्होंने उस समय के सबसे बड़े आर्थिक घोटाले का पर्दाफाश किया था। फिरोज गांधी को भ्रष्टाचार के खिलाफ युद्ध छेड़ने वाला पहला व्यक्ति माना जा सकता है।

1957 में कलकत्ता के उद्योगपति हरिदास मूंदड़ा ने नयी नयी बनी सरकारी इंश्योरेंस कंपनी एलआईसी के ज़रिए अपनी छह कंपनियों में 12 करोड़ 40 लाख रुपए का निवेश कराया था। एलआईसी द्वारा निवेश किया जाना निवेशकों के लिए गारंटी सरीखा था, लेकिन बाद में पता चला कि यह निवेश सरकारी दबाव में एलआईसी की इन्वेस्टमेंट कमेटी की अनदेखी करके किया गया।

इस पूरे मामले के बारे में कांग्रेस से रायबरेली सीट से चुनकर आए फिरोज गांधी को पता चल तो उन्होंने इसके खिलाफ संसद में हंगामा मचा दिया। उन्होंने अपने ससुर जवाहरलाल नेहरु की सरकार पर आरोप लगाया कि सरकार और एलआईसी ने सौदे का विरोध क्यों नहीं किया, जब इसका जवाब वित्त मंत्री टीटी कृष्णामाचारी से मांगा गया तो उन्होंने इसका बड़े गोलमोल जवाब दिये।

तत्कालीन नेहरू सरकार ने मामला कुछ समय तक टालने के बाद बम्बई उच्च न्यायालय के रिटायर्ड जज एमसी छागला की अध्यक्षता में इस घटना की जांच के लिये एक जांच आयोग बिठा दिया।

आज के वर्तमान दौर में सुप्रीम कोर्ट इस विषय पर विचार कर रहा है कि राष्ट्रीय हित से जुड़े मामलों में कोर्ट की कार्यवाहियों का सीधा प्रसारण किया जाए, लेकिन उस दौर में नेहरू सरकार ने इस छागला कमीशन की कार्यवाही जनता के बीच कराने का निर्णय लिया। कोर्ट रूम के बाहर बड़े-बड़े लाउडस्पीकर लगाये गए, ताकि जो लोग अंदर बैठकर कार्यवाही देख न पाएं वे कम-से-कम इसे सुन सकें। जब जज साहब अंदर फटकार लगाते तो बाहर खड़े लोग जोर जोर से तालियां बजाते थे।

अंततः देश के वित्तमंत्री टीटी कृष्णामाचारी को इस्तीफा देना पड़ा। इस घटना के बाद से जवाहरलाल नेहरू के संबंध अपने दामाद से खराब होते चले गए। 1960 में हार्टअटैक से फिरोज गांधी की मृत्यु हो गयी। ऐसी शख्सियत थे फिरोज गांधी।

अब आज क्या हाल है वह भी समझ लीजिए। इस घटना को 60 साल बीत चुके हैं आज भी वही एलआईसी है, लेकिन फ़िरोज गाँधी जैसे नेता नहीं है जो सत्ता पक्ष में रहते हुए भी बेहतरीन ढंग से विपक्ष की भूमिका निभाए। कांग्रेस में भी सिर्फ चापलूस नेताओं की पूछ परख है।

आज भी देश की सबसे बड़ी लाइफ इंश्योरेंस कंपनी एलआईसी सरकारी दबाव में आकर आलोक इंडस्ट्रीज, एबीजी शिपयार्ड, एमटेक ऑटो, मंधाना इंडस्ट्रीज, जेपी इन्फ्राटेक, ज्योति स्ट्रक्चर्स, रेनबो पेपर्स और ऑर्किड फार्मा जैसी कंपनियों में निवेश करती है, जिनकी मार्केट वैल्यू पीक लेवल से 95 पर्सेंट तक गिर चुकी है। इनमें से कुछ कम्पनियों को दिवालिया घोषित करने की प्रक्रिया चल रही है, जिससे इनमें निवेश करने वालो को बहुत नुकसान उठाना पड़ेगा।

आपको जानकर बेहद आश्चर्य होगा कि एलआईसी मेहुल चौकसी की गीतांजलि जेम्स, वक्रांगी और पूरी तरह से डूबने वाली विडियोकॉन इंडस्ट्रीज में भी सबसे बड़ी संस्थागत निवेशक है। जिन 70 कम्पनियों पर दिवालिया होने की तलवार लटक रही है उनमें रिलायंस कम्युनिकेशंस, जीटीएल इन्फ्रास्ट्रक्चर, इलेक्ट्रोस्टील स्टील्स, ऑप्टो सर्किट्स (इंडिया), जायलॉग सिस्टम्स, रोल्टा इंडिया, अबान ऑफशोर, श्री रेणुका शुगर्स और मोनेट इंडस्ट्रीज भी शामिल हैं।

इनमें किया गया एलआईसी का निवेश भी पूरी तरह से डूबा हुआ लग रहा है। एलआईसी के निवेश के डूबने के मतलब है उन लाखों करोड़ों पॉलिसी धारकों के पैसे डूबना, जिन्होंने अपनी जीवनभर की बचत एलआईसी में लगा रखी है।

लेकिन न सत्ता पक्ष में और न विपक्ष में फ़िरोज गांधी जैसा नेता मौजूद हैं, जो संसद में दमदार तरीके से इस घोटाले को उठाएं और इस कदर उठाए कि वित्तमंत्री को इस्तीफा देने को मजबूर होना पड़े।

Share News

You May Also Like

Leave a Reply

Your email address will not be published.