राजनीतिक हलकों में राहुल गांधी की टंकार गूंजने लगी है…उमेश त्रिवेदी

अखिल भारतीय कांग्रेस के 84 वें राष्ट्रीय महाधिवेशन के बाद देश की सियासी तासीर में तेजाब घुलने लगा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के समर्थक भले इसे नकारें, लेकिन अब आम लोग शिद्दत से कांग्रेस के नए अध्यक्ष राहुल गांधी की उपस्थिति महसूस करने लगे हैं। तीन महीने बाद 19 जून को

राहुल 48 वर्ष के हो जाएंगे। इंदिरा गांधी इनडोर स्टेडियम में 84 वें कांग्रेस महाधिवेशन में राहुल गांधी की अध्यक्षीय मौजूदगी और तेवरों को देखने के बाद कांग्रेसजनों में राहत का भाव नजर आ रहा है। उनमें वो तब्दीली महसूस करने लगे हैं, जिसकी जरूरत वो लंबे समय से महसूस कर रहे थे।
राहुल के ये तेवर मई 2004 में चांदी के उड़न-खटोले पर अपनी पहली सियासी उड़ान भरने वाले राहुल गांधी से बिल्कुल एकदम उलट है। वह यूपीए सरकार का जमाना था और सोनिया गांधी संगठन और सरकार में सर्वेसर्वा थीं। ’डायनेस्टिक-पॉलिटिक्स’ का उत्तराधिकारी होने के नाते उनकी पहली उड़ान के वक्त कांग्रेस की आकाश-गंगा में कांग्रेस के तारणहार के रूप में उनके राजनीतिक अवतार की आकाशवाणी भी हुई थी और 26, अकबर रोड स्थित कांग्रेस के मुख्यालय की खिड़कियों से उनके उड़न खटोले पर पुष्प वर्षा भी की गई थी। भाजपा सहित विपक्षी नेताओं के लिए वो चाहे जहां और चाहे जब इस्तेमाल होने वाला राजनीतिक-कटाक्ष थे। उनके ऊपर चस्पां वंश-परम्परा की मुहर को साफ करने में उन्हें पंद्रह साल का वक्त लगा है। उन्हें अगंभीर मानने वाले प्रधानमंत्री मोदी के लिए राहुल सबसे गंभीर सिर-दर्द साबित हो रहे हैं। महाधिवेशन में राहुल का अध्यक्षीय भाषण उनकी राजनीतिक परिपक्वता का इजहार करता है। राहुल की इन खूबियों को हमेशा अनदेखा किया गया कि भरपूर ताकत होने के बावजूद उन्होंने अपने चाचा संजय गांधी के समान कांग्रेस में चमड़े के सिक्के चलाने की कोशिश कभी नहीं की। उनके इर्द-गिर्द स्कैण्डलों की कहानियां अंगड़ाई लेती नजर नहीं आती हैं। वो चाहते तो कभी भी मंत्री भी बन सकते थे। एक मर्तबा प्रधानमंत्री के नाते मनमोहन सिंह ने कहा भी था कि अब राहुल को सरकार में शरीक होना चाहिए। सत्ता से विमुखता का यह भाव उनके आसपास कभी भी सुर्खियों का हिस्सा नहीं रहा। यही नहीं, राहुल ने कई मर्तबा अध्यक्ष बनाने की पहल को ठुकरा दिया। उनकी इन खूबियों को लोगों ने कुछ इस तरह से पढ़ा कि राजनीति में उनकी दिलचस्पी नहीं, मजबूरी है। लेकिन, लगता है कि अब राहुल पूरी तरह से राजनीति में रच-बस रहे हैं। वैसे समय-समय पर होने वाली रायशुमारी या ओपिनियन-पोल में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता का इंडेक्स अभी भी राहुल गांधी से काफी ऊपर है, लेकिन राहुल की नई हमलावर मुद्रा और नए मुहावरे जननायक के रूप में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की भाव-भंगिमाओं में खराश पैदा कर रहे हैं। भाजपा अथवा मोदी की बड़ी परेशानी यह है कि ’सब का साथ, सब का विकास’ जैसे मुद्दों से लोगों का मोह-भंग होने लगा है। इन मुद्दों की बदौलत मोदी ने 2014 में सत्ता हासिल की थी। मोदी के सामने सबसे बड़ी चुनौती नए सिरे से ऐसे नए मुद्दों को तलाशना और तराशना है,  जो लोगों में विश्‍वास पैदा कर सकें कि भाजपा से बेहतर दूसरा कोई राजनीतिक विकल्प नही है। राहुल गांधी के हमलों में तीखापन है और उनके हमले भाजपा नेताओं को आहत भी कर रहे हैं।  राहुल गांधी ने इन जन-धारणाओं को पकड़ लिया है कि प्रधानमंत्री मोदी जितना बोलते हैं, उतना करते नहीं हैं। उनके प्रति लोगो में  विश्‍वास के धरातल रिसने लगे हैं। भाजपा की दिक्कत यह है कि अब कांग्रेस भी सॉफ्ट हिन्दुत्व की राहों पर चल पड़ी है। गुजरात में उसका यह प्रयोग सफल रहा है। अब कांग्रेस ने अपनी राजनीतिक तकरीरों में रामायण-महाभारत के मुहावरों का प्रयोग भी शुरू कर दिया है, जो भाजपा के हिन्दुत्व को घनीभूत करते थे। ये मुहावरे भाजपा में बौखलाहट पैदा कर रहे हैं। ताजा उदाहरण राहुल का अध्यक्षीय भाषण है जिसमें उन्होंने भाजपा को कौरव-सेना निरूपति करते हुए खुद और कांग्रेस को सच के पक्षधर पांडव के रूप में प्रस्तुत किया है। इसका जवाब देने के लिए भाजपा ने रक्षामंत्री निर्मला सीतारमण और गृहमंत्री राजनाथ सिंह जैसे वरिष्ठ नेता मीडिया के सामने उतर आए। बहरहाल राहुल गांधी की रणनीतिक प्रस्तुति में भले ही परिपक्वता दिखाई पड़ने लगी है, लेकिन उपस्थिति में निरन्तरता को लेकर कांग्रेस जन हमेशा परेशान रहते हैं। गुजरात चुनाव में बराबरी की टक्कर देने के बाद त्रिपुरा, मेघालय और नागालैंड के चुनाव में उनकी गैर-मौजूदगी ने कांग्रेस जनों को मीडिया के सामने बगले झांकने के लिए मजबूर कर दिया था।
                                                                                       आलेख :- उमेश त्रिवेदी – लेखक सुबह सवेरे के प्रधान संपादक है।
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