आदिवासी वोट बैंक पर है नजर ….

आदिवासी नेताओं ने हाल ही में छिन्दवाड़ा सहित अन्य जिलो में सामाजिक आन्दोलन और राजनैतिक सोच का परिचय कराते हुए प्रदेश में जनसंख्या के आधार पर राजनैतिक हिस्सेदारी लेने की बात कर अपने समुदाय को लामबंध कर जनाक्रोश रैली के नाम पर शक्ति प्रदर्शन किया , जिससे कांग्रेस ही नहीं बल्कि सियासी पार्टी बीजेपी की चूले हिल गई , इन्हे यह समझ नही आ रहा है की इन्हे साधा कैसे जाय ? …
  आदिवासियों के बदले हुए रुख ने मध्‍य प्रदेश विधानसभा चुनाव 2018 के सियासी समीकरणों को बिगाड़ दिया है. इस बिगड़े हुए सियासी समीकरण ने कांग्रेस ही नहीं, बीजेपी की चिंता भी बढ़ा रखी है. बीजेपी को चिंता यह है कि ब‍ड़ी मुश्किल से उनके पक्ष में आया यह बड़ा वोट बैंक कहीं इन चुनावों में उनसे छिटक न जाए. वहीं कांग्रेस किसी भी कीमत पर अपने पुराने वोट बैंक को वापस हासिल करना चाहता है. उधर, बीजेपी और कांग्रेस के माथे पर पड़ी चिंता की लकीरों को आदिवासी नेता पढ़ने में कामयाब रहे हैं. लिहाजा, उन्‍होंने समर्थन के एवज में मोलभाव करना शुरू कर दिया है. कांग्रेस अभी भी इस मोलभाव के जरिए आदिवासी नेताओं को अपने पक्ष में लाने की कवायद कर रही है. वहीं, बीजेपी ने आदिवासी वोटों को अपने पक्ष में बनाए रखने के लिए अपनी रणनीति में बदलाव किया है.
15 साल पहले कांग्रेस से दूर हुआ आदिवासी वोट बैंक :– मध्‍य प्रदेश विधानसभा की करीब 47 सीटों पर आदिवासी वर्ग का बोलबाला है. 2003 के विधानसभा चुनावों से पहले तक इन सीटों पर कांग्रेस के उम्‍मीदवार जीत दर्ज करते आए हैं. लेकिन, 2003 के विधानसभा के चुनावों में समीकरण बदल गए. कांग्रेस के इस गढ़ में बीजेपी सेंध लगाने में कामयाब रही. बीजेपी ने आदिवासी बाहुल्‍य वाली अधिकांश सीटों पर जीत दर्ज की. 2008 और 2013 के मध्‍य प्रदेश विधानसभा चुनावों में आदिवासी इलाकों से बीजेपी का विजय अभियान लगातार जारी रहा. बीते चुनावों की बात करें तो कांग्रेस आदिवासी बाहुल्‍य इलाकों के अंतर्गत आने वाली महज  15 सीटों पर ही जीत दर्ज कर सकी. 2018 के मध्‍य प्रदेश विधान सभा चुनावों में कांग्रेस अपने पुराने गढ़ में एक बार फिर वापसी करना चाहती है. लिहाजा, उसने आदिवासी बाहुल्‍य इलाकों में प्रभाव रखने वाले राजनैतिक दलों के साथ गठबंधन करने का फैसला किया है.
इन दोनो दलों के गठबंधन के पक्ष में कांग्रेस :- आदिवासी इलाकों में वापसी करने के लिए कांग्रेस जय आदिवासी युवा संगठन (जयस) और गोंडवाना गणतंत्र पार्टी से गठबंधन करने की कवायद में लगी हुई है. इन दोनों दलों का साथ पाकर कांग्रेस  छिंदवाड़ा , बालाघाट, मंडला, डिन्डोरी, बैतूल, अमरिया, शहडोल , अनूपपुर विधानसभा में अपनी दावेदारी मजबूत करना चाहती है. सूत्रों के मुताबिक कांग्रेस की मजबूरी को भांपते हुए दोनों दलों ने कांग्रेस के साथ मोलभाव शुरू कर दिया है. गठबंधन के लिए शुरू हुई प्रारंभिक बातचीत में जय आदिवासी युवा संगठन ने कांग्रेस से 47 और गोंडवाना गणतंत्र पार्टी ने 50 सीटों की मांग कर दी है. फिलहाल, कांग्रेस न ही दोनों दलों को 97 सीटें देने के लिए तैयार है और न ही गठबंधन की संभावनाओं को खत्‍म करने के पक्ष में है.
गठबंधन के समाधान की जिम्मेदारी इन पर  :- कांग्रेस के रणनीतिकारों का मानना है कि आदिवासी इलाकों में जीत हासिल किए बगैर सत्‍ता तक पहुंचना मुमकिन नहीं है. लिहाजा, कांग्रेस किसी भी कीमत में दोनों राजनैतिक दलों को अपने साथ लाना चाहती है. लिहाजा, कांग्रेस आला कमान ने दोनों राजनैतिक दलों को मनाने की जिम्‍मेदारी अनुसूचित जनजाति विभाग के अध्‍यक्ष अजय शाह और सांसद कांतिलाल भूरिया व्  स्वयं प्रदेशअध्यक्ष कमलनाथ पर है . अजय शाह, जय आदिवासी युवा संगठन के नेताओं से संपर्क कर बीच का रास्‍ता निकालेंगे, वहीं सांसद कांतिलाल भूरिया व् कमलनाथ गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के नेताओं से संपर्क करेंगे. जानकार बताते है की गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के राष्ट्रिय अध्यक्ष दादा हिरा सिंग मरकाम की दो बैठके कमलनाथ के साथ हो चुकी है  कांग्रेसी नेताओं की कोशिश होगी कि दोनों दलों को मनाकर कांग्रेस के पक्ष में ला सकें. आगामी विधानसभा चुनावों में आदिवासी वोटों का रुझान कांग्रेस की तरफ किया जा सके.
सूत्रों के अनुसार गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष व्  पूर्व विधायक मनमोहन शाह बट्टी भाजपा नेताओं के सम्पर्क में है , अगर इनका तालमेल बैठ जाता है तो पूर्व विधायक मनमोहन शाह बट्टी अपने स्वयं की पार्टी रास्ट्रीय गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के उम्मीदवारों को चुनावी समर में उतार कर गोंडवाना गणतंत्र पार्टीके टाटा कर विधान सभा में पहुचने का मार्ग प्रशस्त करने के मूड  है ?
Share News

You May Also Like

Leave a Reply

Your email address will not be published.