आजादी की लड़ाई के दलित योद्धाओं की दास्ताँ ….

भारत 72वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है. ऐसे में हम बता रहे हैं मातादीन, झलकारी बाई, ऊधम सिंह, ऊदा देवी पासी, तिलका मांझी आदि दलित योद्धाओं के बारे में. इन जाबांजों ने अंग्रेजों की नाक में दम कर दिया था.

15 अगस्त 2018 को देश आजादी की 72वीं सालगिरह मना रहा है. आजादी की लड़ाई यूं ही नहीं मिली बल्कि इसमें देश के लाखों जांबाजों को अपनी जान की बलि देनी पड़ी. भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, राम प्रसाद बिस्मिल आदि क्रांतिकारियों के अलावा मदन मोहन मालवीय, महात्मा गांधी, लाल बहादुर शास्त्री, जवाहर लाल नेहरू आदि का नाम भी देश को आजाद कराने में प्रमुखता से लिया जाता है. आजादी की लड़ाई में एक वर्ग ऐसा भी था जो कि देश के लिए जान की बाजी लगा रहा था लेकिन इतिहास में अपनी उपस्थिति दर्ज नहीं करा पाया. हम बात कर रहे हैं दलित नायकों की.

तिलका मांझी :- आजादी का पहला स्वतंत्रता संग्राम 1857 से माना जाता है लेकिन अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह का बिगुल 1780-84 में ही बिहार से बज चुका था. बिहार के संथाल परगना में तिलका मांझी की इस विद्रोह के अगुआ थे. युद्ध कला में निपुण तिलका मांझी ने ताड़ के पेड़ पर चढ़कर तीर से कई अंग्रेजों को मौत के घाट उतार दिया था. इसके बाद बंगाल, महाराष्ट्र और उड़ीसा में दलित आदिवासियों ने अंग्रेजों के खिलाफ बगावत शुरू कर दी थी. सिद्धु संथाल और गोची मांझी के साहस और वीरता ने अंग्रेजों को बहुत हानि पहुंचाई थी बाद में उन्हें अंग्रेजों ने पकड़कर फांसी पर चढ़ा दिया.

मातादीन :- अगर 1857 के सिपाही विद्रोह की बात करें तो इसका नायक मंगल पांडे को माना जाता है. मंगल पांडे अंग्रेजी सेना के सिपाही थे. लेकिन उनमें विद्रोह की जो ज्वाला पैदा की थी वो थे दलित समाज से आने वाले मातादीन के शब्द. मातादीन छावनी की कारतूस फैक्ट्री में सफाई कर्मचारी थे. एक दिन छूआछूत को लेकर कोई बात मंगल पांडे और मातादीन के साथ हो गई. मातादीन ने कारतूसों में गाय और सूअर की चर्बी की बात कहकर मंगल पांडे पर तंज कस दिया क्योंकि ये कारतूस मुंह से खोले जाते थे. यह सुनकर मंगल पांडे ने बगावत कर दी. बाद में दलित मातादीन और मंगल पांडे, दोनों को ही फांसी दे दी गई.

चेतराम जाटव और बल्लू मेहतर :-  1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में चेतराम जाटव और बल्लू मेहतर का नाम भी इतिहास में नजर नहीं आता. 1857 की क्रांति का बिगुल बजते ही ये दोनों 26 मई 1857 को सोरों (एटा) की क्रांति में कूद पड़े. अंग्रेजों ने इन दोनों को पेड़ से बांधकर गोली से उड़ा दिया और बाकी लोगों को कासगंज में फांसी दे दी गई. 1857 की जौनपुर क्रांति में बागी घोषित किे गए लोगों में बांके चमार सबसे प्रमुख व्यक्ति थे. ब्रिटिश सरकार ने बांके को जिंदा या मुर्दा पकड़ने के लिए भारी इनाम घोषित किया था. बाद में उन्हें गिरफ्तार कर मृत्यु दंड दिया गया.

वीरांगना झलकारी बाई :- 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं ने भी बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया और अपने प्राणों की आहुति दी. वीरांगना झलकारी बाई भी एक ऐसा ही नाम है जो इतिहास से दूर हैं. झलकारी बाई झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की सेना में थीं. उनके पति पूरन कोरी राजा गंगाधर राव की सेना में मामूली सिपाही थे. उस वक्त रानी लक्ष्मीबाई के भेष में झलकारी बाई ने अंग्रेजों से लोहा लिया था. ये कहानियां भले ही इतिहास में दर्ज नहीं हैं लेकिन बुंदेलखंड में लोगों की जुबान पर मिल जाती हैं.

ऊदादेवी पासी :- 16 नवम्बर 1857 में ऊदा देवी पासी ने एक पेड़ पर चढ़कर कई अंग्रेजों को मौत के घाट उतार दिया था. वे अवध के छठे नवाब वाजिद अली शाह के महिला दस्ते की सदस्य थीं. इस विद्रोह के समय लखनऊ की घेराबंदी के समय अंग्रेजों ने सिकंदर बाग का घेराव कर लिया था. इसमें करीब 2000 भारतीय सिपाही ठहरे हुए थे. ऊदा देवा खतरा देख एक ऊंचे पेड़ पर चढ़ गईं और अपने पास गोला बारूद खत्म होने तक अंग्रेजी सैनिकों को अंदर नहीं घुसने दिया. हालांकि बाद में अंग्रेजी सेना ने बाग में ठहरे सभी सिपाहियों का संहार कर दिया.

महाबीरी देवी वाल्मीकि :- दलित समाज की महाबीरी देवी वाल्मीकि अंग्रेजों की नाइंसाफी के सख्त खिलाफ थीं. अपने अधिकारों के लिए लडऩे के लिए महाबीरी ने 22 महिलाओं की टोली बनाकर अंग्रेज सैनिकों पर हमला किया था. अंग्रेज भी महाबीरी देवी वाल्मीकि के साहस से घबरा गए थे. उन्होंने दर्जनों अंग्रेजों को मौत के घाट उतार दिया. बाद में घिरने के बाद खुद की जान दे दी.

शहीद उधमसिंह :- भारत के स्वाधीनता संग्राम में उधमसिंह एक ऐसा नाम है, जिसने अपने देश के लोगों का बदला लंदन जाकर लिया. जलियांवाला बाग में नरसंहार कराने वाले पंजाब के गवर्नर माइकल ओ डायर को मारने के लिए ऊधम सिंह लंदन पहुंच गए थे. वे 1919 में हुए जलियांवाला बाग का बदला लेने के लिए लंदन पहुंचे थे. लंदन में भरी सभा में ऊधम सिंह को गोलियों से भूनने के बाद ऊधम सिंह भागे नहीं बल्कि अपनी गिरफ्तारी दी. 31 जुलाई 1940 को पेंटविले जेल में वीर उधमसिंह को फांसी दे दी गई.

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