राहुल ने सिर्फ आंख मारी है, मोदी जी तो पूरे देश की मार रहे ….

वैसे पश्चिमी सभ्यता में आंख मारना किसी के विश्वास को जीतने की इच्छा दर्शाने से लेकर रंग जमा लेने और ‘Nailed it’ जैसी बात को दर्शाने के प्रतीक के तौर पर देखा जाता है…

अतुल शुक्ला का विश्लेषण….

बीती 20 जुलाई को संसद में अविश्वास प्रस्ताव पर अपने वक्तव्य के दौरान कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने मोदी सरकार के चार सालों के कामकाज पर घेरते हुए आरोपों की झड़ी लगा दी। नोटबन्दी, जीएसटी, बेरोजगारी, किसानों और छोटे व्यावसायियों में व्याप्त हताश से लेकर फ्रांस से हुई राफेल विमानों की डील तक हर मुद्दे पर राहुल ने मोदी सरकार की नाकामियों को दोहराया।

वक्तव्य के अंत में राहुल ने मोदी सरकार और उनके समर्थकों द्वारा खुद पर की जाने वाली व्यक्तिगत छींटाकशी का हवाला देते हुए यह भी कहा कि उन पर किये जा रही इन छींटाकशी की बौछारों के बावजूद उनके मन में कोई गुस्सा या क्षोभ नही है।

इसका प्रमाण देने के लिए वह अपनी सीट से उठकर प्रधानमंत्री की कुर्सी तक गए और उन्हें गले लगाया। वापस आकर बैठने के दौरान उन्होंने अपने किसी सहयोगी की ओर देखकर आंख मार दी। बस यहीं से आरोपों की मार से बौखलाए सत्ता पक्ष को वह संजीवनी मिल गयी, जिसकी उसे सख्त दरकार थी।

राहुल के आंख मारने (winking) की घटना को सत्ता पक्ष ने प्रचलित तौर तरीकों से बचकाना, अपरिपक्व और संसदीय गरिमा के प्रतिकूल बताकर जरूरी सवालों से लोगों का ध्यान भटकाने की अपनी प्रोपेगेंडा पॉलिटिक्स की शुरुआत कर दी है और इसे सत्ता पक्ष की चरण वंदना करने वाले मीडिया समूहों ने 2019 की तैयारी का आगाज बताकर प्रसारित करना भी शुरू कर दिया है।

हालांकि बाद में अपने वक्तव्य के दौरान प्रधानमंत्री हाथों को विचित्र आकृतियों में नचा-नचाकर लतीफेबाजी करते रहे और जरूरी सवालों के जवाब टालकर अपनी चिर प्रचलित शैली में पिछले छह दशकों की सरकारों के कामकाज की समीक्षा करते दिखे।

आंख मारना (Blinking) हमारे यहां पश्चिम से आया है। हम भाव-भंगिमा, शारीरिक संकेतों और भाषा को अपने अर्थों में अडॉप्ट करते हैं। पश्चिमी सभ्यता में आंख मारना किसी के विश्वास को जीतने की इच्छा दर्शाने से लेकर रंग जमा लेने और ‘Nailed it’ जैसी बात को दर्शाने के प्रतीक के तौर पर देखा जाता है।

जबकि हमने यहां इसे लड़कियों पर फब्तियां कसने, अश्लील इशारे करने और लुच्चई-लफंगई के फूहड़ प्रदर्शन के रूप में अडॉप्ट किया है. हालांकि राहुल गांधी के आचरण पर पश्चिमी प्रभाव ज्यादा है। वह भाव-भंगिमा ही नहीं, बल्कि भाषाई और सोच के स्तर पर भी बेहद अंग्रेजीदां हैं। यही कारण है कि वह हिंदी में भावाभिव्यक्ति करने में अपेक्षाकृत कमतर साबित होते रहे हैं। तथापि यह माना जा सकता है कि राहुल गांधी का आंख मारना संसदीय गरिमा के विरुद्ध हो।

वहीं प्रधानमंत्री मंझे हुए राजनेता और एकेडमिक ज्ञान से कमतर होने के बावजूद व्यावहारिक तौर पर पक्के खिलाड़ी हैं. उन्हें शब्दों, शारीरिक भाव भंगिमाओं से खेलना बखूबी आता है। उनका प्रशंसक वर्ग भी अतिउत्साही है जो उनकी खिलंदड़ अदाओं पर रीझा हुआ है।

ऐसे में सवाल यह है कि प्रधानमंत्री जी क्या मार रहे हैं? आइए जरा देखें :- देश में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश बीते वित्त वर्ष 2017—18 के बीच अपने सबसे निचले स्तर पर रहा, जो पिछले पांच वर्षों में सबसे कम है। औद्योगिक नीति एवं संवर्धन विभाग ‘डीआईपी’ जारी ताजा आंकड़ों के अनुसार इस वर्ष मार्च तक विदेशी निवेश महज तीन फीसदी विकास दर के साथ 4,485 करोड़ डॉलर (2.9 लाख करोड़ रुपये से थोड़ा ज्यादा) रह गया है। इसके उलट रिपोर्ट के मुताबिक ही भारतीय निवेशकों द्वारा अन्य देशों में किया गया निवेश 1,100 करोड़ डॉलर के साथ दुगुने से ज्यादा पहुंच गया है।

वित्त वर्ष 2016-17 में देश में एफडीआइ यानी विदेश निवेश की विकास दर 8.67 थी, तो वित्त वर्ष 2013-14 में यह दर आठ फीसद, वित्त वर्ष 2014-15 में 27 फीसद और 2015-16 में 29 फीसद थी।

यूनाइटेड नेशंस कॉन्फ्रेंस ऑन ट्रेड एंड डेवलपमेंट (अंकटाड) ने भी अपनी एक हालिया रिपोर्ट में कहा था कि वित्त वर्ष 2016 के 4,400 करोड़ डॉलर एफडीआइ के मुकाबले वर्ष 2017 में एफडीआइ आवक घटकर मात्र 4,000 करोड़ डॉलर रह गई।

स्विटजरलैंड की सेंट्रल बैंकिंग अथॉरिटी स्विस नेशनल बैंक द्वारा 28 जून को जारी की गयी रिपोर्ट के अुनसार 2017 में स्विस बैंकों का मुनाफा 25 प्रतिशत बढ़कर 67 हजार 620 करोड़ हो चुका है। इसमें भारतीयों की भागीदारी ये है कि कालाधन के लिए बदनाम स्विस बैंक में 2017 के आखिर में भारतीय पूंजीपतियों की ओर से 7 हजार करोड़ रूपए जमा किए गए जो सीधे तौर पर 50.02 प्रतिशत की बढ़ोतरी है।

सरकारी आंकड़े मूलत: कॉरपोरेट सेक्टर की ग्रोथ बताते हैं। आरबीआई, आईएमएफ, वर्ल्ड बैंक सब इन आंकड़ों के हिसाब से चलते हैं, लेकिन इकोनॉमी में सिर्फ कॉरपोरेट सेक्टर नहीं है। इसमें संगठित-असंगठित दोनों हैं। असंगठित क्षेत्र को डेढ़ साल में दो धक्के लगे- नोटबंदी और जीएसटी. इनकी वजह से असंगठित क्षेत्र की ग्रोथ 10% निगेटिव हो गई है।

असंगठित क्षेत्र के आंकड़े चार-पांच साल बाद सामने आते हैं. तब पता चलेगा कि इकोनॉमी को कितना नुकसान हुआ। असंगठित क्षेत्र हमारी इकोनॉमी में 45% है। इसमें कृषि 14% और बाकी गैर-कृषि असंगठित क्षेत्र 31% है, इसलिए अगर 45% इकोनॉमी की ग्रोथ में 10% गिरावट आई है तो वह (-)4.5% होती है। बाकी 55% वाले कॉरपोरेट सेक्टर में 7% ग्रोथ है तो भी कुल मिलाकर ग्रोथ 3.5% होती है।

रोजगार के अवसर घट रहे हैं। रेलवे में 90 हजार नौकरियों के लिए 2.3 करोड़ लोगों ने अप्लाई किया। मतलब यह कि अंडरएंप्लॉयमेंट बढ़ रहा है। किसान परेशान हैं क्योंकि उनकी लागत बढ़ गई लेकिन उपज के दाम कम हो गए हैं। 93% नौकरियां असंगठित क्षेत्र में ही हैं। वहां बेरोजगारी या कम-रोजगारी बढ़ने से अर्थव्यवस्था में डिमांड कम हो रही है।

देश में बाढ़ की तरह आई बेरोजगारों की एक भीड़ सांप्रदायिक, जातीय खाई को और गहरा कर रही है। नौजवान दूसरों के फ्रिज में झांक रहे हैं। हर स्वतंत्र आवाज को दबाया और कुचला जा रहा है। संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता को चुनौती दी जा रही है, उनमें लगातार हस्तक्षेप किया जा रहा है। एक बहुत बड़ा वर्ग जो इशारों-इशारों में बता रहा है कि वह घुटन महसूस कर रहा है।

जाहिर है राहुल ने सिर्फ आंख मारी है, लेकिन प्रधानमंत्री जी पूरे देश की मार रहे हैं ?

साभार :- जनज्वर

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