योगी ने जीते जी नीरज की पेंशन बंद कर दी, अब बांटेंगे उनके नाम पर पुरस्कार…,

नीरज के जीते जी उनकी पेंशन तो बंद करवा दी, मगर उनके नाम पर कथित राष्ट्रवादी चुटकुलेबाजों को पुरस्कृत करके योगी सरकार तमाम चैनलों के गधा सम्मेलनों में उनसे अपनी जय जयकार करवाने का जुगाड़ तो कर ही सकती है…

सुशील मानव का विश्लेषण ..

‘जियते न करैं राधा, मरे करैं सराधा’ गांव को ये लोकोक्ति पंडावादी पाखंडियों के पाखंड पर चोट करके कही गई है जो हाल फिलहाल उत्तर प्रदेश की योगी सरकार पर पूरी तरह से फिट बैठती है।

गौरतलब है कि योगी सरकार डेढ़ साल से ख्यात कवि—गीतकार गोपालदास की पेंशन पर कुंडली मारे बैठी रही, जिनका थोड़े दिन पहले निधन हो गया। नीरज पाई पाई के मोहताज होकर गुरबा की ज़िंदग़ी जीने को विवश होते रहे और आज जब वो मर गये तो ये निर्लज्ज सरकार पूरी अश्लीलता के साथ उनके नाम पर उनकी स्मृति में पांच नवोदित कवियों को एक एक लाख का ईनाम देने की घोषणा कर रही है। गौरतलब है कि कुछ दिनों पहले ही उन्होंने कहा था कि जब तक मेरी यश भारती की पेंशन बहाल नहीं हो जाती। मैं इस दुनिया से जाने वाला नहीं हूं।

समाजवादी पार्टी से नजदीकी और उनकी सरकार में राजभाषा संस्था का अध्यक्ष बनाकर सम्मानित किये गये गोपाल दास नीरज के संबंध यूपी के राज्यपाल राम नाईक से भी रहे, लेकिन यश भारती पेंशन रोक दिए जाने पर वह योगी सरकार के फैसले के सीधे विरोध में भी आ गए। यश भारती प्राप्त गणमान्य जनों को पेंशन रोक दिए जाने पर उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को भी पत्र लिखा और पेंशन जारी रखवाने की मांग की।

कुछ समय पहले प्रदेश के राज्यपाल राम नाईक नीरज के अलीगढ़ के जनकपुरी स्थित आवास पर पहुंचे। नीरज किसी भी राजनीतिक और सामाजिक मुद्दे पर बेबाक होकर बोलते, चाहे वह सपा के फैसलों के विपरीत ही क्यों न हो? जब सपा सरकार ने लैपटाप वितरण की योजना शुरू की तो उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को पत्र लिखा और सलाह दी कि वह लैपटाप बांटने की बजाय स्कूलों में कंप्यूटर लैब स्थापित करा दें। बच्चों के लिए यह ज्यादा लाभकारी होगा।

इसी तरह जनसंख्या नियंत्रण के लिए प्रधानमंत्री मोदी को भी नीरज ने पत्र लिख डाला। कुछ दिनों पहले ही उन्होंने कहा था कि जब तक मेरी यश भारती की पेंशन बहाल नहीं हो जाती, मैं इस दुनिया से जाने वाला नहीं हूं।

ख्यात गीतकार—कवि नीरज जी कभी किसी स्थायी नौकरी में बँधकर नहीं रहे, तो बुढ़ापे में जीवनोपार्जन के लिए पर्याप्त धन का संचय नहीं कर पाये। 1942 में एटा से हाईस्कूल परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। शुरुआत में इटावा की कचहरी में कुछ समय टाइपिस्ट का काम किया, उसके बाद सिनेमाघर की एक दुकान पर नौकरी की।

लम्बी बेकारी के बाद दिल्ली जाकर सफाई विभाग में टाइपिस्ट की नौकरी की। वहाँ से नौकरी छूट जाने पर कानपुर के डीएवी कॉलेज में क्लर्की की। फिर बाल्कट ब्रदर्स नाम की एक प्राइवेट कम्पनी में पाँच वर्ष तक टाइपिस्ट का काम किया। कालांतर में मेरठ कॉलेज मेरठ में हिन्दी प्रवक्ता के पद पर कुछ समय तक अध्यापन कार्य भी किया, किन्तु कॉलेज प्रशासन द्वारा उन पर कक्षाएँ न लेने व के आरोप लगाये जिससे कुपित होकर नीरज ने स्वयं ही नौकरी से त्यागपत्र दे दिया।

उसके बाद वे अलीगढ़ के धर्म समाज कॉलेज में हिन्दी विभाग के प्राध्यापक नियुक्त हो गये और मैरिस रोड जनकपुरी अलीगढ़ में स्थायी आवास बनाकर रहने लगे। इसी बीच देवानंद सरीखे लोग उन्हें मायानगरी मुंबई फिल्मों के गीत लिखवाने के लिए ले गए। उन्होंने कई फिल्मों के लिए सुपरहिट और सार्थक गीत लिखे भी। एक समय तो 1969-73 थे बीच लगभग हर बड़ी फिल्मों में उन्हीं के लिखे गीत लिये जाते थे, लेकिन वहां की फरेबी दुनिया में मन नहीं रमा तो वो फिर मेरठ लौट आये।

बहरहाल नीरज जी तो नहीं रहे, पर नीरज जी के नाम पर कथित राष्ट्रवादी चुटकुलेबाजों को पुरस्कृत करके सरकार तमाम चैनलों के गधा सम्मेलनों में उनसे अपनी जय जयकार तो करवाने का जुगाड़ तो कर ही सकती है। वैसे भी “आदमी हूं आदमी से प्यार करता हूं” जैसे मानवता और प्रेम के दर्शन के पथिक से नफ़रत और वैमनस्य की राजनीति करने वालों का और क्या सरोकार हो सकता है?

मेरे गांव में एक बेनी बहादुर पटेल हैं, उम्र करीब अस्सी साल। कभी कभार सुबह के वक्त आते हैं मेरे घर। आते ही सबसे पहले चार आखर योगी आदित्यनाथ को गरियाते हैं… बता दें कि योगी सरकार ने सत्ता में आते ही समाजवादी वृद्ध पेंशन योजना बंद कर दी है।

300 रुपये बहुत तो नहीं होते, लेकिन बुजुर्गों के लिए अपने छोटे—मोटे खर्चे के लिए एक छोटी सी उम्मीद तो होते ही हैं। ये सिर्फ एक नीरज या एक बेनी बहादुर का किस्सा नहीं है साहेब, इस देश के हजारों नीरजों और लाखों बेनी बहादुरों की कथा व्यथा है ये।

साभार : जनज्वर

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