कब तक चलेगा लूट का यह सिलसिला , पालकों को लुटने से बचायें जिला प्रशासन …..

आपने हमारे संज्ञान में लाया हम इस मामले की जाँच करवायेंगे ओर कड़ी कार्यवाही करेंगे! इस तरह की बातें अक्सर ही पत्रकारों को उस समय सुनने में मिल जाती हैं जब पत्रकारों के द्वारा किसी अधिकारी से उसके विभाग के तहत होने वाली विसंगतियों के बारे में प्रश्न किये जाते हैं। यक्ष प्रश्न यह है कि सरकारी विभागों के आला अधिकारियों को हर माह की एक तारीख को आखिर पगार किस बात की मिल रही है ?

मामला किसी भी विभाग से संबंधित हो पर छिंदवाड़ा जिले का यह दुर्भाग्य ही माना जायेगा कि विसंगतियों की ओर सत्तारूढ़ भाजपा सहित विपक्ष में बैठी काँग्रेस के नुमाईंदों के द्वारा भी किसी तरह का ध्यान नहीं दिये जाने से अधिकारियों के हौसले पूरी तरह बुलंदी पर ही दिख रहे हैं शिक्षा विभाग का ही अगर उदाहरण लिया जाये तो शिक्षा विभाग में किस तरह अराजकता  मची है यह किसी से छुपी नहीं है ?

निजि शालओं के द्वारा अपने-अपने गणवेश, जूते मोजे, ब्लेजर, स्वेटर यहाँ तक कि मोजे भी विशेष प्रकार के रंगों या डिजाईन वाले चलाये जा रहे हैं इसके अलावा निजि शालाओं में विद्यार्थियों को चार से छः समूहों में बाँटा गया है। सप्ताह में एक दिन इन समूहों में शामिल विद्यार्थियों को उनके समूह के लिये निर्धारित गणवेश में आना आवश्यक होता है। इसका मतलब यह हुआ कि गणवेश के अलावा भी विद्यार्थियों को एक अलग प्रकार की गणवेश भी खरीदने पर मजबूर होना पड़ता है। लूट का सिलसिला यहाँ थमता नहीं दिखता ?

विद्यार्थियों को शाला के द्वारा इशारों ही इशारों में यह भी बता दिया जाता है कि उन्हें फलां बुक सेलर्स के पास से अपनी पाठ्य पुस्तकें खरीदना है। यह सब कुछ शाला की महंगी फीस से इतर ही होता है। इसके बाद भी विद्यार्थियों को शाला के अलाव निजि तौर पर ट्यूशन लेने पर भी मजबूर होना पड़ता है। अब पाठक स्वयं ही अंदाजा लगा सकते हैं कि आज के दौर में पालकों को अपने कलेजे के टुकड़ों को पढ़ाने में कितना जतन करना होता है। पालकों की जेब तराशी किस कदर की जा रही है।

इस पर रोक लगाने के लिये जिले में शिक्षा विभाग की महती भूमिका होती है। राज्य शासन के द्वारा गणवेश और पाठ्य पुस्तकों के लिये कम से कम तीन दुकानें अनिवार्य की गयी हैं। अर्थात एक शाला की गणवेश और पाठ्य पुस्तकें शहर के कम से कम तीन प्रतिष्ठानों पर मिलना चाहिये। इसके लिये राज्य शासन के द्वारा न केवल सर्कुलर जारी किये गये हैं वरन टीमों का गठन करने के निर्देश भी दिये गये हैं। याद नहीं पड़ता कि जिले में कभी भी शालाओं में प्रचलित पाठ्य पुस्तकों और गणवेश की दुकानों का निरीक्षण शिक्षा विभाग के जिम्मेदार अफसरान के द्वारा कभी किया गया हो ?

 नया शैक्षणिक सत्र आरंभ हुए अब समय हो चला है फिर भी अब तक शिक्षा विभाग के आला अधिकारी हाथ पर हाथ रखे ही बैठे दिख रहे हैं। छिंदवाडा जिला कलेक्टर वेद प्रकाश शर्मा से जनापेक्षा है कि वे ही स्व संज्ञान से इस मामले में पहल कर पालकों को लुटने से बचायें ?

निजी स्कूलों में वाहन सुविधा का लोभ दिखाकर बच्चों का नामांकन करने वाले अधिकांश स्कूल संचालक खटारा वाहनों में छात्रों को ढो रहे हैं। इन वाहनों का न तो फिटनेस ठीक है और न ही इनकी परिवहन विभाग से स्कूली वाहन के तौर पर इसका रजिस्ट्रेशन ही कराया गया है। वाहनों में सुरक्षा के मानक तो दूर बुनियादी सुविधा भी मौजूद नहीं है। ऐसे में स्कूल जाने वाले नौनिहाल अपनी जान जोखिम में डालकर इन वाहनों से स्कूल पहुंच रहे हैं।

भले ही स्कूलों के नए शैक्षिक सत्र की शुरुआत हो चुकी हो ओर होने वाली हो लेकिन स्कूलों की सुविधाओं में कोई इजाफा नहीं हुआ है। वाहन सुविधा देने का दावा करने वाले स्कूल संचालक अब भी बच्चों को लाने ले जाने के लिए खटारा वाहनों का उपयोग कर रहे हैं और इन वाहनों में स्कूल जाने वाले मासूम अपनी जान जोखिम में डालकर स्कूल जा रहे हैं।

वर्तमान परिवेश में शिक्षा के बाजारीकरण ने शिक्षा के ही नहीं सुरक्षा के मानकों को भी ताक पर रख दिया है। बच्चों को आवागमन की सुविधा के लिए संचालित हो रहे वाहनों की दशा बेहद खराब है। अभिभावकों को लुभाने के लिए वाहन सुविधा उपलब्ध होने का दावा करने वाले अधिकतर स्कूलों के पास अपने वाहन तक नहीं हैं।

किराये पर चलने वाले इन वाहनों में उच्च स्तरीय सुविधा तो दूर बुनियादी सुविधाओं का भी अभाव है। इन खटारा वाहनों में बच्चों को बैठने के लिए पर्याप्त सीट तक उपलब्ध नहीं हैं। स्कूल संचालक इन खटारा वाहनों में बच्चों को भूसे की तरह लादकर स्कूल पहुंचा रहे हैं।

परिवहन विभाग से न तो ऐसे वाहनों का फिटनेस प्रमाण पत्र लिया जाता है और न ही स्कूली वाहन के तौर पर रजिस्ट्रेशन ही कराया जाता है। पैसे कमाने की होड़ में इनकी मरम्मत भी नहीं कराई जाती है। बिना फिटनेस प्रमाण पत्र के सड़कों पर दौड़ रहे खटारा स्कूली वाहन अक्सर हादसों का शिकार हो जाते हैं और इसका खामियाजा नौनिहालों को भुगतना पड़ता है

 संजय डेहरिया व् निरूपम बैनर्जी की रिपोर्ट 

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