चार बांस बल्लियों के आसरे रेंगती जिन्दगी….

साल के 8 माह लकड़ी का पुल जोड़े रखता है दुनिया से …

 बारिश में चार गुना लंबा हो जाता है सफर, विकास से कोसों दूर दौरियापाठा के लोग….

 आंगनबाड़ी के लिए दस किमी, अनाज के लिए पांच किमी का पैदल सफर….

लकड़ी के पुल से चल रही दौरियापाठा के १२ परिवारों की जिंदगी….

तामिया से राजा खान 

वर्तमान में विकास की बाते करने बाले राजनेता और सरकारी सुविधाओ का जाल बिछा  देने का दंभ भरने बाले अधिकारियो के लिए यह किसी तमाचे से कम नही होगा जहाँ आज भी चार बांस बल्लियों के सहारे जिन्दगी का सफर तय कर रहे है ग्राम दौरियापाठा के भोले भाले आदिवासी , और तो और ये वही  संरक्षित जनजाति के लोग है जिनकी आबादी विलुपत्ता की कगार पर है , जिनके संरक्षण और विकास के लिए प्रति बर्ष सरकार करोड़ो रूपये पानी की तरह बहा रही है  परन्तु इनकी दशा आज भी किसी भिखारी से कम नही है , परन्तु दाद देना होगा इस भारिया जनजाति के लोगो को जो अपनी खुद्दारी ,संस्क्रती और बसाहटो को इतना प्रेम करते है की जीने के लिए किसी चुनौती का सामना करने को तैयार है !

आईये आज हम ऐसे ही जुझारू भारिया जनजाति के एक गाँव आपको लिए चलते है जहाँ आप खुद ही महसूस करने लगेंगे की 21 वी सदी में विकास की क्या यही परिभाषा है ? या यहाँ कोई सरकारी तन्त्र है ? या फिर जनता के द्वारा चुनी गई सरकार है ? क्या यही लोकतंत्र है जहाँ जनता मालिक है ? लोकतंत्र के इन मालिको की दशा दिशा देखने के बाद हमे खुद पर शर्म आने लगेगी ? 21 वी सदी के अन्वेषण पर …..?

सतपुड़ा की सुरम्य वादियों में बसा छिन्दवाड़ा जिले के तामिया विकास खंड का  पातालकोट , जो अपने प्राक्रतिक सौन्दर्य और दुर्गम पहाडियों , दुर्लभ जड़ी बूटियों के अद्भुद संसार के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है ! पातालकोट आदिवासियों की एक अलग दुनिया वाले 12 आबाद गांवों का समूह है जो अपनी संस्कृति, इतिहास और भौगोलिक स्थिति से इसकी वैश्विक नक्शे में अलग पहचान है तो वहीं दिन में भी रात का एहसास कराने वाला यह क्षेत्र अनुपम और अदुतीय है !

इन्ही ऊंचे नीचे पहाड़ों के बीच एक छोटा सा गांव दौरियापाठा, यहाँ कुल 12 परिवार निवास करते है , इसकी आबादी 77 है सभी परिवार आदिवासी, आदिवासी बाहुल्य तामिया विकासखंड की ग्राम पंचायत रातेड़ के ढाने से पक्की सडक़ 5 किमी दुरी पर है। यहाँ के हालात यह है कि साल में 8 महीने ये एक गहरी और खतरनाक पहाड़ी नदी पर बने लकड़ी के पुल का लांघकर अपनी पंचायत तक पहुंचते हैं। पहली बारिश में यह पुल बह जाता है फिर बारिश खत्म होने तक अपने जरूरतों को पूरा करने के लिएइन्हेचारगुना सफर तय करना पड़ता है।

पंचायत :-  ग्राम पंचायत रातेड़ …..ग्राम दौरियापाठा….कुल जनसंख्या – 77….कुल बच्चे – 16…. प्राथमिक शाला में – 2 बच्चे…. मिडिल स्कुल में – 9 बच्चे…. आंगनवाडी में – 5 बच्चे  

इस गांव की महिलाओं और बच्चों को 10 किमी दूर कर्रापानी गांव की आंगनबाड़ी से पोषण आहार मिलता है तो गांव से 5 किमी दूर गैलडुब्बा गांव की राशन दुकान से सरकारी अनाज मिलता है। गांव के 11 बच्चे गैलडुब्बा के जनजाति विभाग के आश्रम में रहकर पढ़ते हैं। मजेदार बात है कि इस क्षेत्र में पदस्थ शासकीय विभाग के मैदानी कर्मचारियों ने भी आज तक गांव देखा नहीं है। जनसेवा और जन कल्याण की बड़ी – बड़ी बाते करने बाले जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों को इस गांव का नाम तक पता नही है !

11 किमी का सफर बन जाता है 40 किमी :-  साल में आठ महीने दौरियापाठा से गायनी नदी पर लकड़ी का पुल पार कर रातेड़ होते हुए 4 घंटे में10 किमी पैदल चलकर छिंदी आते है , बरसात के दिनों में पुल बह जाता है तो यहाँ के निवासी अपनी जरुरतो की चीजे लाने के लिए इन्हे चार गुना यानी 40 किमी का सफर तय करना पड़ता है तब ये लोग दौरियापाठा से कोलूखेड़ा, सूखाभण्ड, गैलडुब्बा, सातलवाह तक 20 किमी पैदल और सातलवाह से 20 किमी मोटर गाड़ी से तामिया पहुँचते हैं। कई बार पूरा दिन एक तरफ के सफर में गुजर  जाता है। दूसरे दिन ये लोग इसी रास्ते से अपने गांव लौटते है।

पहाड़ी झरनों से बुझती है प्यास इस गांव के सभी परिवार आपस में इतने मिलजुलकर रहते है कि वे हर काम सहकारिता की भावना से करते हैं। हर परिवार से २-२ हजार रुपए एकत्र कर पीवीसी के पाइप खरीदे गए। गांव से आधा किमी दूर छोटी डाबर झरने से ३ हजार फीट पाइप लाइन बिछाकर बसाहट तक लाई गई। इस पाइप से आधा इंच पाइप का कनेक्शन लेकर लोग दिन भर पानी भरते हैं।

सौर्य ऊर्जा से घरों में उजाला :-जंगल के बीच बसा यह गांव बिजली से कोसो दूर है। यहां हर घर की छत पर सोलर पैनल लगी हैं। गरीब परिवार के लोगों ने अपनी क्षमता के हिसाब से छोटी बड़ी बैटरी लगाकर घरों में 3 से 5 वाट के बल्ब जला पाते हैं। इन्हीं बल्बों के सहारे वे अंधकार से जूझ रहे हैं। बारिश में सूर्य की रोशनी कम होने के कारण कई बार बैटरी चार्ज नहीं हो पाती तो चिमनी ही इनकी जिन्दगी को रोशन करती

5-5 एकड़ जमीन के मालिक :- गांव की सबसे खास बात यह है कि सभी भारिया परिवारों के पास 5-5 एकड़ जमीन के पट्टे हैं। ये वन भूमि है, जो ऊबड़ खाबड़ है। इन खेतों में महज बरसाती फसल  मक्का, ज्वार और बल्लर की खेती होती है। गर्मी में सभी परिवार के सदस्य जंगल में चिरौंजी की गुठली, महुआ बीनकर अपना जीवन गुजर बसर करते हैं एकमात्र वनोपज ही इनकी आय का साधन है।

लकड़ी गाडक़र बना दिए शौचालय :- इस गाँव में पहुंचने के लिए जटिल प्राक्रतिक भौगोलिक परिस्थितियों को लाँघ कर पार करना किसी चुनौती से कम नही है ! विकास या सरकारी सुविधाओ का आभाव एक कारण यह भी है ! इन्ही सब के चलते इस गांव में भवन निर्माण सामग्री ले जाना बेहद दुश्कर कार्य है। इस ग्राम पंचायत ने लकड़ी गाडक़र प्रोफाइल शीट लगा दी। शौचालय निर्माण में टैंकों का काम भी बेहद घटिया स्तर का हुआ। इसलिए गांव में किसी भी शौचालय का उपयोग नहीं हो पा रहा है !

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