विश्व पर्यावरण दिवस पर विशेष ….

विश्व पर्यावरण दिवस पर विशेष ….

*मनुष्य बौद्धिक औऱ तकनीक प्रगति के कितने ही ऊँचे समवेत शिखरों पर क्यों ना पहुँच गया हो परन्तु उसकी जड़े प्रकृति में है*

*आलेख :- राकेश प्रजापति*

      तकनीकी औद्योगिक समाज और वर्तमान बेपरवाह लोगो ने पर्यावरण संबंधी समस्याएं उत्पन्न कर दी है इनमें से कई इतनी गंभीर है कि उन्होंने पृथ्वी पर जीव मात्र के अस्तित्व को ही खतरे में डाल दिया है पृथ्वी से अनेक जीव जंतु , वनस्पतियां विलुप्त हो गई है ,पारिस्थितिकीय सन्तुलन विगड़ गया है पृथ्वी का तापमान लगातार बढ़ रहा है जिससे मॉस्किटो का हमला मानव जाति के लिए खतरे का संकेत दे रहा है , उद्योग प्रधान देशों में तेजाबी वर्षा की विभीषिका ने वैज्ञानिकों पर्यावरणविदो को झकझोर दिया है , स्वीडन के वनविद डॉ जैन रेमरोड ने मेक्सिको में हुई नवी विश्व वन कांग्रेस में अपनी मनोव्यथा व्यक्त करते हुए कहा था “वनों के अस्तित्व के लिए आवश्यक जैविक परिस्थितियां बदल रही है जहरीली गैसों और पर्यावरण असन्तुलन से पत्तियों पर प्रभाव पड़ता है, तेजाबीकरण के कारण जमीन में धीरे-धीरे बदलाव आ रहा है सारे भूमंडल में जलवायु परिवर्तन का खतरा मंडराने लगा है साल में मात्र 35 से 40 दिनों बारिश होना बो भी कहीं सूखे की विभीषिका तो कहीं बहुत ही कम समय मे अत्याधिक बारिश याने बहुत बड़े मूल्य दाँव पर है और इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं की हमारा सामूहिक भविष्य वनो के स्वास्थ्य और उनके जिंदा रहने की क्षमता पर निर्भर है”
बड़े पौधों के लिए उत्पन्न खतरे की अपेक्षा कर ये नौकरशाह अपने स्वार्थ सिद्धि के जरिए वनों का अस्तित्व लगभग समाप्त कर रहे हैं , लाखों की तादात में प्रतिवर्ष पेड़ों की कटाई से पर्यावरण को संतुलित करने वाले घटकों को समाप्त किया जा रहा है , ” क्योंकि पेड़ पौधे आवाज नहीं उठा सकते और अचल होने के कारण बदला लेने के लिए आगे नहीं बढ़ सकते” परन्तु इसकी विभीषिका के संकेत हमे अप्रत्यक्ष रूप से दिखाई पड़ने लगे थे , अक्टूबर 1985 में पश्चिम जर्मनी में बर्लिन के निकट बीमार ग्रुनवाल्ड वन के वनाधिकारी श्री हिलमात क्लीन ने बातचीत के दौरान विश्वविख्यात पर्यावरणविद “व्रक्षमित्र” माननीय सुंदरलाल बहुगुणा से कहा था कि ‘ वनों औऱ पेडों की बात छोड़ दीजिए, लेकिन स्यूडोक्रुप्स की नई बीमारी के कारण निरीह बच्चो की जाने क्यों जा रही है ? यह नई बीमारी उधोग प्रधान नगरो में व्याप्त है , जिसके कारण एकाएक साँस बन्द होने से बच्चे मर जाते  है , चाहे पेडों की मौत हो , चाहे मध्यप्रदेश में भोपाल कई तरह  हजारो लोगो की सामूहिक मोत हो या वायु औऱ जल के प्रदूषण एवम रेगिस्तानों के विस्तार के कारण लाखो लोगो की धीरे – धीरे होने वाली मौत – सबका एक ही कारण है वह है प्रकृति के साथ मनुष्य का घोर दुर्व्यवहार औऱ इसमे अहम भूमिका निभाते है, आधुनिक नोकरशाह जिन्होंने दुर्भाग्य से इसे विकास की संज्ञा देकर गौरवान्वित किया है, विकास की इस परिभाषा का जन्म इस भ्रांत दृष्टि में से हुआ है कि मनुष्य प्रकृति का स्वामी है , मालिक है , ” धरती का भाग्य ” नामक पुस्तक में जोनाथन शैल कहते है – मनुष्य की ताकत में वृद्धि से मनुष्य और धरती के बीच शक्ति संतुलन में एक निर्णायक औऱ बहुआयामी परिवर्तन हुआ है, प्रकृति जो एक जमाने मे क्रूर औऱ भयावह स्वामी के रूप में देखी जाती थी अब पूरी तरह गुलाम औऱ गुलाम हो चुकी है औऱ मनुष्य बौद्धिक औऱ तकनीक प्रगति के कितने ही ऊँचे समवेत शिखरों पर क्यों ना पहुँच गया हो परन्तु उसकी जड़े प्रकृति में है, इसलिए यह सन्तुलन उसके विरोध में चला गया है औऱ इसके कारण धरती के लिए जो खतरा पैदा हुआ है,वह स्वयं मनुष्य के लिए भी है।

         तकनीक का उपयोग विपुलता के अर्जन के लिए हुआ था , यूरोप मे औधोगिक क्रांति के बाद उसकी गति तीव्र हो गई थी, औधोगिक दृष्टि से उन्नत देशो में एशिया , अफ्रीका औऱ दक्षिण अमेरिका ने अपने उपनिवेश स्थापित किए, इन देशों में वनिकरणीय औऱ अवनिकरणीय प्राकृतिक संसाधनों का विपुल भंडार था, तकनीकी के उपयोग से वे इस भंडार का शोषण करके चुटकियों में सम्पन्न बन गए, उनकी देखा-देखी सम्रद्धि हासिल करना सभी राष्टों का लक्ष्य हो गया , इस पद्धति का मुख्य अंग है केंद्रीय उत्पादन और वनीकरण, प्रारम्भ में कम आबादी वाली उत्तरी क्षेत्र में बड़े उधोगों के कारण समस्याएँ पैदा नही हुई , उधोग केंद्रों के निकट बड़े- बड़े नगर विकसित हुए , केंद्रीकृत औधोगिक उत्पादन की पद्धतियाँ वानिकी ओर कृषि के क्षेत्र में भी लागू की गई , इससे मनुष्य और प्रकृति के संबन्धों में बहुत बड़ा परिवर्तन आया , कृषि अब सांस्कृतिक जीवन पद्धति नही रह गई है बल्कि व्यापार बन गई है , किसान का एकमात्र ध्येय बन गया एकल फसलो में अधिक पैसा कमाना , प्राकृतिक वन जो विभिन्न प्रजाति औऱ आयु के पेड़ों , झाड़ियो , बेलो, कन्दमूल , कीड़े मकोड़े और वन्य जीवों के जीवित समुदाय थे , इमारती औऱ औधोगिक लकड़ी की खानों में बदल गए , यह प्रक्रिया अभी भी जारी है , कई स्थानों में मिश्रीत प्राकृतिक वनों को अपनी अवैध आय का साधन बनाकर नोकरशाहो कि पनपती कुव्यवस्था ने वनों को काटकर , उजाड़कर रख दिया तथा फिर सामाजिक वानिकी के नाम पर नए आयाम पैदा कर एकल प्रजाति के पेड़ रोपे पनपाये जा रहे है , इससे इमारती लकड़ी ओर औधोगिक कच्चे माल का उत्पादन अवश्य ही बढ़ गया है लेकिन मानव जाति की दो मूलभूत पूँजीया यानी ” मिट्टी और पानी ” पर इसका बड़ा प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है , इसके कारण वनों को पुनः उगाने की योजनाएं भी विफलता की ओर अग्रसर है , भारत मे तीव्रता से पनपी व्यापारिक वन प्रबन्धता ने वनवासियों को ही वनों का शत्रु बना दिया है , प्राकृतिक वनों के विनाश के कारण वनवासी कन्दमूल , जंगली फल , शहद व अन्य खाद्य पदार्थो से वंचित कर दिए गए है , जिंदा रहने के लिए वे मजबूरी में लकड़हारे बन गए है , परन्तु उनकी जीविका के एकमात्र साधन को शासन तंत्र में बैठे नोकरशाही लॉबी की कुदृष्टि का शिकार बेरहमी से होना पड़ रहा है और उन पर वन विभाग के उच्चाधिकारियों की घिनोनी करतूतों के चलते झूठे प्रकरणों में फँसकर तरह – तरह से यातनाएँ सहने पर मजबूर होना पड़ रहा हैं।
विनाश का कूफल केवल वनवासियों को ही नहीं भगत में पड़े वनों से निकलने वाली नदियों की उपत्यकाओं में या वनों के बाहर रहने वाले लोग भी विनाशकारी बढ़ो और नालों के सूखने के शिकार हो रहे है , पानी की गुणवत्ता का भी ह्यस हुआ है , हिमालय के पहाड़ी ढालों पर बाँस ( ओक ) के वन थे , चश्मो का पानी स्वास्थ्य और हाजमा बढ़ाने बाला होता था , लेकिन जब चीड़ के वनों को व्यापारिक वनों में बदल दिया गया , तो पानी के विशिष्ठ गुण समाप्त हो गए , वन लुग्दी व प्लाईवुड के कारखानों के शिकार भी हुए , जहाँ भी लुग्दी प्लाईवुड के बड़े – बड़े कारखाने स्थापित हुए है , वन विलुप्त हो गए , भारत मे बाँस दुर्लभ हो गए , असम में प्लाईवुड के कारखाने ने वहाँ के वनों को उजाड़ दिया है , उत्तराखंड और पश्चिम हिमालय में स्थित चीड़ के समुद्र अब चीड़ के श्मशान बन गए है ।
प्रदूषण अधिकाधिक उपभोग में विश्वास करने वाली हमारी वस्तुवादी सभ्यता का उपहार है , इसलिए प्रदूषण का इलाज  तकनीकी उपायो को अपनाने में नही है , हमे विकास की परिभाषा ही बदलनी होगी , ” ढाई हजार वर्ष से भी पहले बुद्ध ने विकास का लक्ष्य स्थायी सुख शांति और अंतोतगत्वा संतोष की प्राप्ति को बताया था , इसकी शुरुवात प्रत्येक मनुष्य की आवश्यकताओं की पूर्ति से लेकिन वासनाओं  एवम लालच की मौत ( तर्षणाक्षय) से होनी थी , ” गांधीजी ने मानव और प्रकृति के सम्बन्धो की व्याख्या करते हुए कहा था – प्रकृति हर एक कि आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए पर्याप्त है , लेकिन थोड़े लोगो के लोभ लालच के लिए कुछ नही है ।
यह चिंतन नई तकनीक के उपयोग के विरुद्ध नही लेकिन निश्चित ही यह केन्द्रीयकरण औऱ प्रकृति का निर्मम शोषण कर प्रशासनिक तंत्र में बैठे नोकरशाहो के काले कारनामो एवम कुनीति के विरुद्ध अक्षरशः सत्य है ,  सन 1945 के मुकाबले सन 2025 में हमारी पानी की आवश्यकता सम्भवतः तीन गुना होगी , पेड़ , जल संरक्षण करते है परन्तु वर्तमान परिवेश में अंधाधुंध औधोगिकरण , फर्टिलाइजर , ओजोन लेयर का डेमेज , और आम जनता के व्यवहार , जल संरक्षण का क्षय पर्यावरण संतुलन को खतरा पैदा कर रहे है , पर्यावरण के प्रति  लोगो के क्रूर व्यवहार के कारण धरती गम्भीर रूप से घायल हो गई है , हमे एक ऐसी तकनीक और जीवनशैली की आवश्यकता है जो मिट्टी की गुणवत्ता को बढ़ाने और जल स्रतो का संरक्षण करते हुए धरती के घावों को भर सके ।

यह आलेख मध्यप्रदेश के पर्यावरण मंत्रालय एवं इफ्को सहित अनेक पत्र पत्रिकाओं द्वारा भी प्रकाशित किया गया है 

लेखक : आकाशवाणी / दूरदर्शन समाचार संवाददाता है 

Share News

You May Also Like

Leave a Reply

Your email address will not be published.