नई दिल्ली :- 224 सीटों वाले कर्नाटक विधानसभा के 222 विधायक चुने जा चुके हैं और राज्यपाल वजूभाई वाला ने 104 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी भारतीय जनता पार्टी के नेता बीएस येदियुरप्पा को गुरुवार की सुबह राज्य के मुख्यमंत्री पद की शपथ भी दिला दी है. येदियुरप्पा पहले भी राज्य के सीएम रह चुके हैं. बुधवार की रात येदियुरप्पा को राज्यपाल की तरफ से सरकार बनाने का न्योता जाने के खिलाफ राज्य में 78 सीटों के साथ दूसरे नंबर की पार्टी कांग्रेस और 38 सीट के साथ तीसरे नंबर की पार्टी जेडीएस ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और फिर बुधवार और गुरुवार की दरम्यानी रात 2 बजे से सुप्रीम कोर्ट में 3 जजों की बेंच ने दोनों पक्षों की दलील सुनी कि राज्यपाल का येदियुरप्पा को शपथ के लिए बुलाने का फैसला गलत था या सही था.

एक पक्ष तो कांग्रेस और जेडीएस थे जिनकी तरफ से अभिषेक मनु सिंघवी कोर्ट में दलील रख रहे थे. दूसरा पक्ष था केंद्र सरकार जिसकी तरफ से पक्ष रख रहे थे देश के सबसे बड़े सरकारी वकील अटॉर्नी जनरल केके वेनुगोपाल. एक और पक्ष था- दो बीजेपी विधायकों की तरफ से पूर्व अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी भी कोर्ट में बहस कर रहे थे. सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ, किस पक्ष ने क्या कहा और उन सबको सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा, ये सब आपको पता होगा. कांग्रेस ने शपथ ग्रहण पर रोक लगाने की मांग की और दावा किया कि उनके पास बहुमत है और उनके 116 विधायकों के दस्तखत वाली चिट्ठी को राज्यपाल ने नजरअंदाज किया है.

बीजेपी विधायकों के वकील मुकुल रोहतगी ने कहा कि शपथ ग्रहण होने दिया जाए क्योंकि बहुमत का फैसला तो विधानसभा के अंदर ही हो सकता है. करीब 3 घंटे से ज्यादा समय तक चली बहस में तमाम पक्षों की तरफ से पेश किए गए दर्जनों दलीलों के बीच केंद्र सरकार की तरफ से पेश अटॉर्नी जनरल केके वेनुगोपाल की एक दलील ऐसी रही जिसने कर्नाटक में भारतीय जनता पार्टी और बीएस येदियुरप्पा के विधानसभा में बहुमत साबित करने के प्लान का हिंट दे दिया.

शपथ से पहले निर्वाचित विधायकों पर लागू नहीं होता है दल बदल निरोधक कानून :- जस्टिस एके सीकरी, जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस शरद बोवडे कुल तीन जजों की बेंच में करीब सवा घंटे तक कांग्रेस की तरफ से अभिषेक मनु सिंघवी बहस कर चुके थे. कांग्रेस और जेडीएस को राज्यपाल के ऊपर जितने सवाल उठाने थे और इससे पहले के सुप्रीम कोर्ट के जिन फैसलों का जिक्र करना था, वो अपने पक्ष में कर चुकी थी. फिर कोर्ट ने सिंघवी से पूछा कि क्या आपके पास बीजेपी विधायक दल के नेता बीएस येदियुरप्पा की राज्यपाल को लिखी 15 और 16 मई की चिट्ठी की कॉपी है जिसके आधार पर राज्यपाल ने उन्हें सरकार बनाने का न्योता दिया. सिंघवी बोले- नहीं.

 फिर बेंच ने पूछा- क्या ऐसा हो सकता है कि बिना मुख्यमंत्री को शपथ दिलाए, चुने गए विधायकों को शपथ दिलाई जाए. इस पर अटॉर्नी जनरल केके वेनुगोपाल ने कहा- ऐसी परंपरा नहीं है. फिर बेंच ने पूछा- किस आधार पर आप बहुमत का दावा कर रहे हैं, क्या आप हमें वो पत्र दिखा सकते हैं जो येदियुरप्पा ने राज्यपाल को लिखा क्योंकि कांग्रेस-जेडीएस का कहना है कि उसने 116 एमएलए के समर्थन का पत्र राज्यपाल को सरकार बनाने का दावा करते हुए दिया था. इस पर वेनुगोपाल ने कहा- उनके दस्तखत सही हैं या नहीं, ये कहना मुश्किल है. मैं केंद्र की तरफ से पेश हुआ हूं. मेरे पास भी वो पत्र नहीं है. ये पूरा ग्रे एरिया है और सिर्फ अटकल के आधार पर बिना तथ्यों और पत्र के किसी निष्कर्ष पर पहुंचना ठीक नहीं है.

इस पर बेंच ने कहा- ये इतना भी ग्रे एरिया नहीं है. आंकड़े आपके केस को सपोर्ट नहीं करते हैं. कांग्रेस का कहना है कि बिना खरीद-फरोख्त के आप बहुमत साबित नहीं कर सकते. इस पर वेनुगोपाल ने कहा- ये भी तो है कि अभी दल बदल निरोधक कानून लागू नहीं होगा. चुने गए विधायक जब तक शपथ ना ले लें, ये कानून उन पर लागू नहीं होगा. वो इस्तीफा भी तो दे सकते हैं. इस पर बेंच ने टिप्पणी की- ये बात तर्कसंगत और न्यायसंगत नहीं है. फिर वेनुगोपाल ने इस बात पर कोई जोर नहीं दिया. शायद उन्हें अहसास हो गया होगा कि कानूनी दलील देने के चक्कर में उनके मुंह से वो बात निकल गई है जो बीजेपी और येदियुरप्पा के बहुमत जुटाने के प्लान का हिस्सा हो.

अटॉर्नी जनरल केके वेनुगोपाल ने जो कहा वो फिर से समझिए. उन्होंने कोर्ट से कहा कि कर्नाटक में जो विधायक चुने गए हैं, उन्होंने अभी तक शपथ नहीं ली है इसलिए उन पर दल बदल निरोधक कानून के तहत कार्रवाई नहीं हो सकती. आपको पता तो होगा ही कि शपथ सिर्फ मुख्यमंत्री या मंत्री नहीं, विधायकों को भी लेना होता है. जब नई विधानसभा का गठन होता है तो सबसे पहले प्रोटेम स्पीकर चुनाव जीतकर आए विधायकों को सदन की सदस्यता की शपथ दिलाते हैं. वेनुगोपाल का कहना रहा कि जब तक ये शपथ नहीं हो तब तक दल बदल कानून लागू नहीं होगा क्योंकि वो चुनाव तो जीते हैं लेकिन सदन के सदस्य नहीं बने हैं.

 मतलब अभी इन विधायकों का मामला चुनाव आयोग और विधानसभा के बीच में है. चुनाव आयोग ने उन्हें जीत का सर्टिफिकेट दिया है लेकिन वो उन्हें विधानसभा में जमा करके सदस्यता की शपथ लेनी है. वेनुगोपाल की ये दलील दलीय आधार पर चुनाव कराने वाले भारत में एक गलत नजीर पेश कर सकती है क्योंकि इसका मतलब ये भी निकलता है कि किसी राज्य का विधानसभा चुनाव हो या लोकसभा का, जब तक विधानसभा या लोकसभा में जीते विधायक या सांसद शपथ ना ले लें, तब तक वो पार्टी लाइन से हटकर जो मन कर सकते हैं या जिस तरफ मन करे, उधर जा सकते हैं.

अब ये समझिए कि अटॉर्नी जनरल की इस दलील से बीजेपी और येदियुरप्पा का बहुमत प्लान कैसे लीक हुआ या कम से कम हिंट तो मिल ही गया. वेनुगोपाल ने कहा कि शपथ से पहले दल बदल कानून का डंडा नहीं चलेगा और चुने गए विधायक इस्तीफा भी दे सकते हैं. ये तो दो-तीन दिन में आपने कहीं ना कहीं पढ़ ही लिया होगा कि बीजेपी के बहुत जुटाने के प्लान में एक विकल्प ये भी है कि कांग्रेस और जेडीएस के कुछ विधायक इस्तीफा देकर सदन में नहीं आएं या बहुमत साबित करने के दौरान ना आएं और बाद में इस्तीफा दे दें.

इससे बहुमत परीक्षण के दौरान सदन में मौजूद सदस्यों की संख्या कम हो जाएगी और बीजेपी को बहुमत साबित करने के लिए 112 नहीं, 106-107-108 टाइप का नंबर भी सूट करेगा. इस्तीफा देने वाले विधायक दोबारा चुनाव लड़ें और बीजेपी उन्हें अपने टिकट पर उप-चुनाव लड़ाकर ले आए, इसमें कोई विघ्न-बाधा नहीं है. कांग्रेस और जेडीएस विधायकों से फ्लोर टेस्ट से पहले इस्तीफा कराकर सदन में बहुमत का ही आंकड़ा नीचे लाने की बीजेपी की रणनीति और येदियुरप्पा के मास्टरप्लान का हिंट चाहे-अनचाहे केके वेनुगोपाल ने सुप्रीम कोर्ट में दे दिया. कांग्रेस और जेडीएस ने हिंट को पकड़ा है इसलिए दोनों ने अपने-अपने विधायकों को बिना मोबाइल और फोन के रिजॉर्ट और होटल में अब तक छुपा रखा है.