आशाराम को उम्र कैद न्यायोचित पर अंधभक्त भी सबक लें : अनिल शर्मा

आस्था व श्रद्धा को कुचलकर गुरू भक्ति को कलंकित करने वाले आशाराम को न्यायालय ने जो सजा मुकर्रर की है, वह इस तरह के अपराध घटित करने वाले शख्स के लिए बिल्कुल न्यायोचित है, पर जो श्रद्धा व आस्था में इतने विवेक शून्य हो जाते हैं। जिनको गलत व सही में फर्क नजर नहीं आता है। उन्हें भी ऐसी घटनाओं से सीख व सबक लेने की जरूरत है। वे भक्ति करें पर अंध भक्त न बनें, ऐसी घटनाओं के लिए छद्म भेषधारी आडम्बरी तो पूरी तरह दोषी है, लेकिन कहीं न कहीं वे अंध भक्त भी जिम्मेदार हैं जो ऐसे लोगों को मौका देते हैं। भविष्य में इस तरह की घटनाओं की पुर्नरावृत्ति न हो और आडम्बरियों की बजह से सनातन धर्म पर कोई उंगली न उठा सके। 

जिस तरह सनातन धरम में मान्यता है कि देर है अंधेर नहीं, ठीक वैसे ही न्यायालय का फैसला वेशक देर से आए लेकिन न्यायिक होगा, आशाराम के मामले में भी कुछ ऐसा ही हुआ है, आडम्बरी आशाराम के पाप का घड़ा जब भर गया तो उनका भेद खुलने के ससाथ पाप कृत्य भी जग जाहिर हुए, जिसको उनके अंधभक्त मानने को तैयार नहीं थे, और कुछ आज भी आंखें बंद कर आस्था व श्रद्धा का राग अलाप रहे हैं, वहीं दूसरी ओर वे धन्यवाद के पात्र हैं, जिनके सामने सच्चाई आई तो न केवल बुराई व अन्याय के खिलाफ आवाज बुलंद की, बल्कि तमाम अड़चनों को सहते हुए न्याय के लिए आशाराम के खिलाफ न्याय की आशा में पूरी मुस्तैदी से डटे रहे। उनकी संघर्षशीलता से अन्ध भक्तों को प्रेरणा लेनी चाहिए। 

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