क्या कमलनाथ का आदिवासी प्रेम मात्र दिखाबा ….

तीन- तीन आदिवासी विधायको के होते हुए भी आदिवासी महिला कर्मचारी का शोषण .. पूर्व मुख्यमंत्री के जिले में महिला कितनी सुरक्षित ….आदिवासी विधायको की रहस्यमयी चुप्पी का राज आखिर क्या है ? आखिर क्यों निकम्मा प्रशासन मानसिक बलात्कारी रेंजर को बचाने पर उतारू ….. आदिवासी समाज यह कब तक सहेगा या फिर क्रांति की अनुगूँज जल्द ही सुने पड़ेगी …….

प्रदेश में आगामी दिनों में होने वाले 28 सीटों पर उपचुनाव की आहट के साथ ही राजनेताओं का आदिवासियों को लुभाने का नित नया पाखंड शुरू हो गया है ! ताकि किसी भी तरीके से आदिवासी वोट बैंक पर सेंध लगाई जा सके । इसी तारतम्य में पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ की भी नौटंकी  देखने को मिली ? प्रदेश सरकार की मंत्री उमा ठाकुर द्वारा आदिवासी संगठन जयश को आतंकी संगठन बताने पर पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ आदिवासी नेताओं के साथ धरने पर बैठे ! तो क्या राजनेताओ को आदिवासियो से वाकई लगाव है ? या

आदिवासियों के वोट पाने की खातिर दिखवे की नौटंकी  ? वाकई आदिवासियों की चिंता राजनेताओं को है ? यह सवाल अपने आप में अनेकों सवालों को जन्म देता है ?क्या कमलनाथ को यह नही मालूम कि उन्ही के गृह जिले में आदिवासी महिलाओं का शारीरिक, मानसिक और आर्थिक शोषण हो रहा है ? इससे ज्यादा शर्मनाक बात यह है की छिंदवाड़ा जिले में आदिवासियों का प्रतिनिधित्व करने के लिए 3  विधायक जुन्नारदेव से सुनील उइके , अमरबाड़ा से कुँअर कमलेश शाह और पांढुर्णा से नीलेश उइके तीनो युवा विधायक है । बाबजूद इसके भारिया समाज की एक महिला कर्मचारी पर उसके ही वरिष्ठ अधिकारी कामपिपासू रेंजर सुरेंद्र सिंह राजपूत द्वारा शारीरिक ,मानसिक प्रताड़ना के साथ साथ छेड़छाड कि काली करतूते समाचार पत्रों कर सुर्खिया बनी हुई है ? पीड़ित शोषित आदिवासी महिला न्याय के लिए  जिम्मेदार अधिकारियों की चौखट खटका रही ? महिला को कहीं से भी न्याय नही मिल रहा है ! जिले के निकम्मे प्रशासनिक अधिकारी उचित कार्यबाही करने की बजह पीड़ित महिला की जगह मानसिक बलात्कारी रेंजर का साथ दे रहे है ? वन विभाग के Dfo अखिल बंसल और Ccf श्री कोरी वासना से लबरेज रेंजर सुरेंद्र सिंह राजपूत को संरक्षण दे रहे है । गौरतलब है कि Dfo महोदय वन विश्राम ग्रह में डेरा जमाए हुए है और उनकी सेवा शुष्राषा की जिम्मेदारी रेंजर ने ले रखी है जानकार बताते है कि dfo सा. अकेले रहते है ? खैर… इससे हमे क्या ? मुफ्त में जनता की कमाई के टुकड़े तोड़ रहे है और उसी जनता के साथ न्याय करने में कैसा गुरेज साहब …

पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ के जिले में आदिवासी महिलाओं के यह हाल हैं… ? बावजूद इसके कांग्रेस के तीनों विधायक इस पर चुप्पी साधे हुए हैं आखिर क्यों..? क्या यही कांग्रेस और पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ का आदिवासी प्रेम है..?
तीनो युवा तुर्क आदिवासी विधायको की धमनियों का लहू क्या पानी हो गया है ? जो अपने ही समाज की आबला पर होने बाले जुल्म पर चुप्पी साधे हुए है ? क्या इसके लिए भी पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ की इजाजत लेनी होगी …? की कब वोट की खातिर इस मुद्दे पर गिरगिटी रंग दिखाना है ? जगजाहिर है कि इन्ही आदिवासीयो के वोटों से कमलनाथ छिंदवाड़ा से लगातार जीतते आये है ?
वैसे तो दोनों ही प्रतिद्वंद्वी पार्टियां कांग्रेस और भाजपा आदिवासियों को बरगलाने का काम बर्षो से करती आई है । नही तो आजादी से इतने बर्षो बाद भी इन भूमि पुत्रो की हालात जस के तस है ?
इस मामले में राजनैतिक पंडितो का कहना है कि आदिवासियों का असली लीडर तो स्व मनमोहन शाह बट्टी ही था ? जिसने अपनी स्वयं की भूमि तैयार कर दोनों ही दल क्रमशः भाजपा और कांग्रेस को जबरदस्त टक्कर दी थी और समाज को एकजुट करने का काम किया था ! इसी का परिणाम है कि कुछ हद तक आदिवासी संगठित हुए हैं ? परंतु नेतृत्व क्षमता का फिर भी अभाव है ! जो भी आदिवासी नेता वर्तमान में राजनीतिक दलों के उच्च पदों पर हैं उन्होंने अपने ही समाज को भाजपा और कांग्रेस के हाथ बेचने का काम किया है ? इन्हें बरगलाने का काम बदस्तूर जारी है …?

पांढुर्णा विधायक नीलेश उइके ने कहा कि मुझे इस मामले की पूरी जानकारी नही है परंतु मैं कलेक्टर , डी एफ ओ ,सीसीएफ से मिलकर महिला को अवश्य न्याय दिलाया जाएगा । वहीं रेंजर पर उचित कार्यवाही करवानी की बात कही , प्रशासनिक अधिकारीयो की संदेहास्पद  कार्य प्रणाली से कमलनाथ जी को अवगत करुंगा !

अगली कड़ी में हम और भी राजनैतिक दलों पर चर्चा करेंगे…………..

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